हर कोई चाहता है कि उसकी भी कोई अपनी पहचान हो. आज के समाज में नारी के सन्दर्भ में यह बात और भी जरूरी हो जाती है. अस्मिता की तलाश में ही......
31 अक्टूबर 2012
अस्मिता: ग़ज़ल
अस्मिता: ग़ज़ल: रिश्ते कहने से क्या बदलते हैं? ये तो ताउम्र साथ चलते हैं। शायरी और किसे कहते हैं। आंसू ही गीत बन के ढलते हैं। उन के आगे क्या गिडगिड...
ग़ज़ल
रिश्ते कहने से क्या बदलते हैं?
ये तो ताउम्र साथ चलते हैं।
शायरी और किसे कहते हैं।
आंसू ही गीत बन के ढलते हैं।
उन के आगे क्या गिडगिडाते हो
कभी पत्थर भी क्या पिघलते हैं/
अक्ल से काम ले दिल पे न जा।
दिल तो बच्चों से हैं मचलते हैं।
अजीब दौर है आये दिन ही
हादसे होते - होते टालते हैं।
वक्त पे तुम भी सम्भल जाओगे
कदम हर शख्स के फिसलते हैं।
ये तो ताउम्र साथ चलते हैं।
शायरी और किसे कहते हैं।
आंसू ही गीत बन के ढलते हैं।
उन के आगे क्या गिडगिडाते हो
कभी पत्थर भी क्या पिघलते हैं/
अक्ल से काम ले दिल पे न जा।
दिल तो बच्चों से हैं मचलते हैं।
अजीब दौर है आये दिन ही
हादसे होते - होते टालते हैं।
वक्त पे तुम भी सम्भल जाओगे
कदम हर शख्स के फिसलते हैं।
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