11 मई 2017

कविता

ओ मेरे छलिया!

तुम से मिलना
कोई संयोग नहीं था।

तुम धीरे धीरे से
होले होले से
कदम बढ़ाते गए।
मेरी जिन्दगी में आते गए।।

दिलोदिमाग पर
करते गए घर।
और मैं....
दुनिया से बेखबर

तुम्हारे खाबों की बदलियों में
भीगती गयी, होती रही सराबोर।
एक अदृश्य डोर...
बांधती रही मुझे बरबस
खींचती रही तुम्हारी ओर।।

मुझे लगा था,
मेरे साथ तुम भी
इस बन्धन में बंध चुके हो।

तभी तो यूँ मेरी ओर
इस तरह झुके हो।।

पर न जानती थी मैं
एक चतुर आखेटक हो तुम।
और मैं..
तुम्हारे बिछाये स्नेह-पाश में गुम

अकेली रह जाऊँगी।
तलाशती तुम्हें..
अपने आसपास ।

तुम्हारी मीठी बातें
और दिल चुरा लेने वाली
वंशी की तान
हो जाएगी,
बीते समय की बात।

अब न होगी
तुमसे
वो पहले सी मुलाकात।।

अब
नहीं डालेगी उहापोह में
वो स्नेह भरी पुकार,
अब नही करेगी विचलित
तेरी वंशी की गुहार।।

एक मोहक छलावे में
छला गया
यह बावरा मन
धीरे धीरे बहल तो जायेगा।

पर फिर से
किसी अजनबी के लिए
अपने मन-मंदिर के द्वार
खोल नहीं पायेगा।
बस सोचता रहा जाएगा।

मेरे कान्हा!
बस सोचता ही रह जायेगा।।

9 मार्च 2017

माँ

            (1)  

माँ बच्चे के रिश्ते से बढ़
रिश्ता बन न पाया।
माँ की गोद में स्वर्ग का सुख है,
माँ ईश्वर की छाया।

जब तक बच्चा भूखा हो
माँ अपना पेट न भरती।
खुद गीले पर सो लेती,
बच्चा सूखे पर करती।

बच्चे की हर गलती को
माँ अनदेखा कर देती है,
उसके दुख को सह पाती न,
ओर आँखें भर लेती है।

हर इक बच्चे के संग-संग जब
ईश्वर जा न पाया।
माँ का रूप धरा उसने तब,
और दुनिया में आया।।

              (2)

गुनगुनी सी धूप है माँ
ईश्वर का रूप है माँ।

मीठी सी लोरी है
खुशियों की तिजोरी है।

ममता की मूरत मां
हर वक्त की जरूरत मां।

टूटे दिल की आस है माँ
मन का विश्वास है माँ।
इसीलिए तो खास है माँ।।

हाँ! इसीलिए तो खास है माँ।।

डॉ. पूनम गुप्त

5 दिसंबर 2014

कविता

औरों से अब मत
दया की भीख ले
अपना बनता हक
छीनना सीख ले.

अब चुप रहना
निर्बलता मानी जाती है
क्रोधित स्वर की शक्ति
पहचानी जाती है.

शांति और अहिंसा के
आयाम हैं बदले
जीवन-मूल्य भी बदले,
उनके नाम भी बदले .

समय के परिवर्तन से
तुम्हें बदलना होगा
छोड़ पुरानी राह
नयी पे चलना होगा.

                डॉ. पूनम गुप्त

18 अक्तूबर 2014

( लघु-कथा घुसपैठ )

                 दीपावली से दो रोज़ पहले त्यौहार के लिए मैं परिवार सहित छोटा-मोटा सामान खरीद रही  थी। लक्ष्मी  माता के कलैंडर का मोल पूछते समय मैंने उसे छुआ तो उसका कागज़ मुझे प्रतिवर्ष लिए जाने वाले कलैंडर से कुछ भिन्न सा लगा। कागज़ बहुत ही हल्का था।
                इस सम्बन्ध में मैंने दुकानदार से पूछते हुए उसे और कलैंडर दिखाने को कहा।प्रत्युत्तर में वह बोला-
  " और नहीं हैं जी , सभी ऐसे ही हैं। फटेगा नहीं यह,चाइनीज़  है जी चाइनीज़ ! सस्ता और टिकाऊ।"  

   "चाइनीज़?"- मैं बहुत हैरानी से बोली। पिछली कई दुकानों पर हम बिजली की सजावटी लड़ियाँ  उनके चाइनीज़ होने की वजह से ही छोड़ कर आये थे। भारतीय बिजली की लड़ियाँ  किसी दुकानदार के पास थी ही नहीं। बच्चों के खिलौने, बिजली से चलने वाले  सजावटी गिफ्ट, दीये और प्लास्टिक के रैक आदि बहुत सारा छोटा-मोटा सामान , सब चाइनीज़ थे। 

"अब यह  कलैंडर भी? लक्ष्मी माता का, हमारे दिन-त्योहारों का!"- बरबस ही मेरे मुंह से निकल पड़ा।

                   "दिन-त्यौहार तो हमारे ही हैं इस पर,बस कागज़ उनका है।उनकी फैक्ट्रियों में बना है जी यह। इसीलिए तो कह रहा हूँ - यह फटेगा नहीं।"  दुकानदार हमे समझाने की कोशिश कर रहा था।

"अब यह हैलिकॉपटर देखिये आप।अनब्रेकेबल है जी। बच्चा गिरा भी दे तो टूटेगा नहीं।सिर्फ 20 रुपये का है।हमारे इण्डिया में कहाँ बनता है जी ऐसा माल।यह तो चीन का कमाल है जी!"- दुकानदार बड़े गर्व से कहता चला जा रहा था।
               हमें चीन का कमाल दिखाने वाला वह भोला भारतीय दुकानदार सचमुच चीन के इस खतरनाक कमाल को नहीं समझ रहा था।बड़े दुखी और भारी मन से उस  कलैंडर  को वहीं छोड़ हम आगे बढ़ आये थे - भीड़ में किसी ऐसे दुकानदार की तलाश में ,जो इस चीनी घुसपैठ का हिस्सा न बन रहा हो।
                                                              -------
                                             डॉ. पूनम गुप्त 

13 जुलाई 2014

हाय गर्मी

त्राहि- त्राहि हो रही चहुं ओर धूप से.
व्याकुल हो रहे प्राणी दिखते हैं विद्रूप से.

पंछी चोंचें खोल खोल पानी को चाहें.
गर्मी से हो त्रस्त सभी भरते हैं आहें.

मारे प्यास गर्मी के बच्चे हैं बेहाल.
कब होगी वर्षा होंठों पर यही सवाल.

कृपा आपकी होगी प्रभु तो मिलेगी राहत.
क्या राजा क्या रंक सभी को एक ही चाहत.

सबकी सुनो पुकार प्रभु न देर लगाओ.
कुछ पल के लिए ही सही प्रभु बादल बरसाओ.

28 अगस्त 2013

राधा अष्टमी पर विशेष

होंठो पे एक नाम रहता है अब
हर साँस  मेरा श्याम कहता है अब

नासिका में नटवर की सुरभि बसी
 सुन्दर छवि मन से जाये न कहीं

नजरें उठा के मैं देखूं जिधर
मोहन ही मुझको तो आता नज़र

जब भी चलूं संग मेरे चले
बैठे वह संग घने कदम्ब के तले

कानो में गूंजते हैं कान्हा के स्वर 
बस गया मेरे उर में मुरलीधर 

रोम-रोम में मेरे माधव समाया 
अंग-संग मेरे सदा उसकी छाया 

फिर क्यों विरह मुझको उसका सताए 
इक पल भी उस बिन नहीं चैन आए 

रातों को भी अब न लगती पलक 
सपनों में भी सांवरे की झलक 

उस का ही नूर, मुझ में उसी का सरूर 
इतना समीप है वह  फिर भी है दूर 

व्याकुल हो जो मैं उसको पुकारूँ
 बाट  जोहूँ निसि दिन,रास्ता निहारूं 

राधा खड़ी सोचे यमुना के तीर 
कैसी है मीठी सी , यह 'बिरहा की पीर' 

तन से भले दूर पर जुड़ी  हुई मन से
 जानती है वह  अलग नही अपने मोहन से 

कृष्ण दिल की धडकन  तो राधा ही श्वास है 
मोहन है प्रेम तो राधा विश्वास है। 

मोहन है प्रेम तो राधा विश्वास है ।।


15 अप्रैल 2013

नारी


रौंदोगे कब तक
 नारी का तुम  सम्मान ?
कब तक समझोगे
 तुम उसको एक सामान।

रखोगे तुम कब तक 
उससे एक ही नाता?
कब समझोगे उसे
 बहन बेटी या माता।

क्यों भूल जाते हो
जननी है वह तुम्हारी
और सहचरी ,
जीवन में भरती उजियारी।

नारी है शक्ति
 न समझो  उसे क्षीण तुम।
दुर्गा है, मानो मत 
उसको दींन-हीन तुम।

उसे कुचलने का 
कभी जब सोचोगे,
अपने हाथों अपनी 
जड़ तुम नोचोगे।

हाँ!अपने हाथों अपनी 
जड़ तुम नोचोगे।

31 अक्तूबर 2012

अस्मिता: ग़ज़ल

अस्मिता: ग़ज़ल: रिश्ते कहने से क्या बदलते हैं? ये तो ताउम्र साथ चलते हैं। शायरी और किसे कहते हैं।  आंसू ही गीत बन के ढलते हैं।  उन के आगे क्या गिडगिड...

ग़ज़ल

रिश्ते कहने से क्या बदलते हैं?
ये तो ताउम्र साथ चलते हैं।

शायरी और किसे कहते हैं। 
आंसू ही गीत बन के ढलते हैं। 

उन के आगे क्या गिडगिडाते हो 
कभी पत्थर भी क्या पिघलते हैं/

अक्ल से काम ले दिल पे न जा।
 दिल तो बच्चों से हैं मचलते हैं।

अजीब दौर है आये दिन ही 
हादसे होते - होते टालते हैं।

वक्त पे तुम भी सम्भल जाओगे 
कदम हर शख्स के फिसलते हैं।


13 अक्तूबर 2012

स्वयंवर


                                                                                              
स्वयंवर
 जो हुआ था अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका का
सीता और द्रौपदी का

क्या वास्तव में स्वयंवर था क्या?
अगर था,
तो क्या थी स्वयंवर  की परिभाषा ?

स्वेछित  वर चुनने का अधिकार
अथवा
कन्या का नीलामी युक्त प्रदर्शन!
जिसमे इच्छुक उमीदवार
धनबल की अपेक्षा
 लगाते थे अपना बाहू-बल
दिखाते थे अपना पराक्रम और कौशल
और जीत ले जाते थे कन्या को
भले ही उसकी सहमति हो या न हो.

तभी तो उठा लाया था  भीष्म
उन तीन बहनों को
अपने बीमार,नपुंसक भाइयों के लिए
और अर्जुन ने बाँट ली थी याज्ञसेनी
 अपने भाइयों में बराबर

वास्तव में ही अगर
स्वयंवर का अधिकार
नारी को  मिला होता
तो अम्बा की
आत्म(हत्या) का बोझ
इतिहास न ढोता.
महाविध्वंस्कारी,महाभारत का
 महायुद्ध न होता
और हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास
 कुछ और ही होता .
हाँ! कुछ और ही होता .

4 अक्तूबर 2012

ग़ज़ल

जब सपना टूट कोई जाता है, दुःख होता है.
जब अपना रूठ कोई जाता है ,दुःख होता है.

कितनी मेहनत से पलते-बढ़ते पौधे
विरवा सूख जब  जाता है,दुःख होता है.

विश्वासों से बने दिलों के मंदिर में
बोला झूठ जब जाता है,दुःख होता है

जीवन की उतरती साँझ में जीवन-साथी का
साथ छूट  जब जाता है,दुःख होता है.

सपनों के पावन अनमोल खजाने को
गैर लूट जब जाता है,दुःख होता है.

29 सितंबर 2012

    ग़ज़ल 


मत समझो मुँह  न खोलेंगे 
हक छीनोगे तो बोलेंगे।


मत सोचो बिक जायेंगे
धन देख के हम न डोलेंगे।


साँपों को दूध पिलाओ न 
ये तो विष ही घोलेंगे।

उनसे मरहम की आशा?
वे तो जख्म टटोलेंगे .

खून बहा  निर्दोषों का 
कर  गंगाजल से धो लेंगे।

मन हल्का हो जाएगा 
खुल कर के जो रो लेंगे।